Thursday, 13 April 2017

पढ़ता

खुद को जिंदा रखने के लिए भी 
लिखना पड़ता है अब तो
बदलते वक्त में कोई किसी को 
ढंग से पढ़ता कहाँ है?

पाँव

तपती धूप में
अब नहीं जलते
मजदूरों के पाँव
अमीरों की तरह
वे भी अब 
कठोर हो गए हैं।

Sunday, 19 March 2017

मदारी

आस्तीन के सांपों से कोई रिश्ता नहीं रहा मगर
वह शहर में मदारी के नाम से मशहूर हो गया ।

शोहरत

जरा सी शोहरत क्या हासिल कर ली उसने
कि शहर की हवाएँ भी उसके ख़िलाफ़ हो गईं।

ताज

लार लपेटे चुपचाप बैठे हैं व्याघ्र साधु बन
सुना है उसे भी नया ताज मिलने वाला है।

आशियाना

जिंदगी का आशियाना भी कुछ अजीब सा है
एक दीवार जोड़ता हूँ तो दूसरा दरक जाता है।

Saturday, 17 December 2016

रोशनी

बुझाते रहे वे हर झोपड़ी की रोशनी
और महल उजाले से आबाद हो गए|

दोस्त

कभी बेवफा होना जरूरी हो जाता है खुद के लिए भी।
कुछ दोस्त दोस्ती निभाने का शऊर नहीं सीखते कभी।।

आसमान

हमने ही तय कर रखा है अपना छोटा आसमान
हमीं परेशां हैं बरगद को बोनसाई बनता देखकर।

लूटतंत्र

पहले रक़ीब हुआ करते थे अब दोस्त हो गए।
लूटतंत्र में अब चूहे ही बिल्ली के साथ हो गए।

लड़ना

हक़ीक़त से रूबरू होना सालता है मुझे अब भी
मैंने मुसीबतों से हँस कर लड़ना नहीं सीखा अभी।

Wednesday, 23 November 2016

दुश्मन

इस देश को अब दुश्मनों की जरुरत नहीं
यह देश भरा पड़ा है आस्तीनों की साँपों से|

Tuesday, 22 November 2016

बेवफ़ा

जितने बेवफ़ा थे सब के सब अब वफ़ा कर रहे हैं|
जो एक दिल अजीज़ थे वही अब दगा कर रहे हैं|

चेहरा

अपना ही चेहरा अब अपरिचित सा लगने लगा है|
कि बदलते वक्त के साथ बहुत बदल सा गया हूँ मैं|

Sunday, 20 November 2016

कमी

हज़ार कमियों के साथ अपनाया है तुम्हें।
लाख तोड़ना चाहो नहीं तोड़ पाओगे हमें।

मशहूर

जब तक जिंदा थे थे कौन।
अब मर कर मशहूर हो गए ।

विषमता

विषमताओं के साथ 
अपनाना चाहता हूँ
खुद को
तुमको
सबको
ताकि
खोने से बच सकूँ
खुद को
तुमको
सबको।

राम बनना ही काफ़ी नहीं

राम बनना ही काफ़ी नहीं
वंचितों की रक्षा के लिए
हर एक रावण के ख़िलाफ़
मुस्तैदी से खड़ा होना भी जरूरी है।

सिर्फ हाँथों में अंगारे
लेकर चलने से क्या हासिल होगा?
इस डरावने अंधेरे के ख़िलाफ़
एक मुक्कमल मशाल जलाना भी जरूरी है।

सिमट गई हैं गरीबों की अंतड़ियां भूख से
अनगिनत भीख मांगते हाँथों को
अपनी ही खोई हुई जमीन पाने के लिए
एक दूसरे का हाँथ थामना भी जरूरी है।

मैं नहीं कहता कि
सब कुछ यूँ ही सहन करते जाओ साथी
सड़ी हुई इस व्यवस्था के खिलाफ
निर्णायक लड़ाई में लामबंद होना भी जरूरी है।

हम और तुम तो
एक मोहरा भर हैं हुक्मरानों का
बढ़ते अत्याचार को जमींदोज करने के लिए
हर एक कंठ को
प्रतिरोध की आवाज बुलंद करना भी जरूरी है।

आओ तुम भी साथ दो न मेरा
इस व्यवस्थागत महासमर में
तुम्हें अपनी अंतरात्मा को भी
अब एक नई धार देना भी जरूरी है।

गूंगे कहे जाओगे गर अब चुप रहे
बेबस, लाचार बने रहने का वक्त नहीं यह
तुम्हें ही उठाना है भार कंधे पर
तुम्हें अब अपनी ताकत दिखाना भी जरूरी है।

किसके भरोसे बैठे हो तुम अब तक
तुम्हें गुमराह कर
कुर्सी हथियाने वालों को
अब नीचे गिराना भी जरूरी है।

बदल दो हर एक तस्वीर अपने घर की
जो तुम्हें धोखा देती हो
शोषितों की तकदीर बदलने के लिए
तुम्हें एक नया इतिहास लिखना भी जरूरी है।

कब तक बंद रखोगे
खुद की ही तकदीर अपनी मुट्ठी में
उठो,जागो तुम्हें धूल समझने वाली हवाओं को
आंधी बन जगाना भी जरूरी है।

तुम्हारी ही जागीर है यह सब कुछ
तुम्हारा ही अपना वतन है
तुम्हारे ही विचारों में घर बनाए
काफ़िरों को भगाना भी जरूरी है।

गर चाहते हो शांति से जीना मेरे साथी
तो राम की तरह ही एक बार
खुद के रावण को मारना भी जरूरी है।
और गुजारिश भी है यह कि
हर एक रावण के खिलाफ लड़ते हुए
खुद को रावण बनने से बचाना भी जरूरी है।

सबूत

कातिल ही दे रहे हैं बेगुनाही का सबूत
यह घनघोर समय है स्याह उजाले का।

नफ़रत

बहुत नफ़रत नफ़ासत से सँजो रखा था दिल में 
और वक्त ने याद को तेरी मुहब्बत बना डाला।।

उसूल

सोचा था उतने बुरे नहीं होंगे साहब के उसूल
हैरत हूँ कि गिर चुके हैं वो अपनी नजरों में भी।

पिता

पिता को 
बचपन से महसूस करते हुए
उन्हें करीब से देखते - समझते हुए
कई एक वर्ष बीत गए
और अब
अनथक पिता
वृद्ध हो गए ।

पिता
अब और भी संजीदगी से
पढ़ाने लगे हैं बच्चों को
जिंदगी का पाठ
पिता को लगने लगा है कि
बच्चों को जीने की कला समझाना
खुद पुनर्जीवित हो जाना है।

पिता
बच्चों की मृदुल हँसी में
पाने लगे हैं खुद की मुस्कुराहट
बच्चों को आशीष देते हुए
पिता भावुक होने लगे हैं
असीम प्रेम लुटाने लगे हैं
अक्सर।

पिता
अब प्रगाढ़ संबंधों में
अनवरत खोजने लगे हैं अगाध प्रेम।

पिता
अब आत्मीय जनों की
शब्दों की चोट से
आहत होने लगे हैं
अंतहीन मन की गहराईयों तक
दर्द महसूस करने लगे हैं।

पिता
अब व्याकुल होने लगे हैं
हर एक त्यौहार पर
इंतजार करने लगे हैं
अपने सगे-संबंधियों का
ताकि घर को घर कहा जा सके।

पिता
घर के टूटने के सवालों पर
अंदर ही अंदर बिखरने लगे हैं
जिंदगी की इस बेहिसाब भागती
आपाधापी को ही
परिवार के टूटने की
वजह समझने लगे हैं।

पिता
अब बात-बात पर
रहने लगे हैं उदास
रात भर चिंता में
डूबने लगे हैं
पिता अब
किसी अनहोनी की
आशंका में जीने लगे हैं।

पिता
अब परिवार की खुशहाली के लिए
देवी-देवताओं से मनौती मांगने लगे हैं
मन ही मन बुदबुदाने लगे हैं मंत्र
पिता की आँखों में
अब अधूरे सपने
सूखने लगे हैं।

पिता
अपनी डायरी में
लिखने लगे हैं दुःख-दर्द
मन की व्यथाएं
मां संग बांटने लगे हैं
पिता अब
अनगिनत बीमारियों से जूझने लगे हैं।

अब मैं
पिता के गहरे सवालों को
उनकी असीम वेदना को
शिद्दत से महसूस करते हुए
श्रवण की तरह
पिता की जीवन यात्रा
का सहभागी बनने लगा हूँ
अश्रु - श्रद्धा पूरित 
नमन करने लगा हूँ|

दुश्मन

दुश्मनों से अभी तक लड़ना नहीं सीखा मैंने
अब भी प्यार करता हूँ और हार जाते हैं वो।

Saturday, 16 January 2016

छोटे लोग ही बड़ा होते हैं

कुछ लोग जानवर की तरह होते हैं
जो बेरहमी से कुचल देते हैं
इंसानियत को सड़क पे  
अपने गरूर में |

और कुछ लोग इंसान होते हैं
जो बेरहमी से रौंदे गए
अनजान व्यक्ति में भी
अपनों की तरह
जीने की आस खोजते हैं
दुआ करते हैं
मन्नत मांगते हैं|

ताकि मानवता को जिंदा रखा जा सके
प्रेम को नफ़रत के बाजार में
शर्मिंदा होने से बचाया जा सके|

मेरी निग़ाह में
वो लोग बड़े होते हैं
जो दरअसल
समाज की निगाह में छोटे होते हैं|

जो सूट-बूट पहनना नहीं जानते
बोलने का सलीका नहीं सीख पाते
परंतु सड़क पर गिरे हुए व्यक्ति को
सहारा देने से नहीं चूकते |

रात-दिन अपनों से लड़ने के बावजूद
फूटपाथ पर सोकर
जमीन बेचकर
बड़े अस्पतालों में
अपनों का इलाज कराते हैं
बार-बार दुत्कारे जाने पे भी
वे नहीं डगमगाते
असीम सहनशीलता के साथ
बर्दाश्त कर जाते हैं सब कुछ|

जब तक इन बड़े लोगों को
हम छोटा समझने की भूल करते रहेंगे
हम छोटे रह जाएंगे
तमाम संभावनाओं के साथ
हम संकुचित हो जाएंगे|   

Sunday, 3 January 2016

भरोसा नहीं होता है..

कैसे कहूँ कि तेरे धूप से उजाला नहीं होता है
भूखे-नंगों के इस शहर में सवेरा नहीं होता है
सारी की सारी हवाएं कैद हैं एक खिड़की में
सरकार कोई भी हो अब भरोसा नहीं होता है|

Wednesday, 30 December 2015

फ़ौलादी इरादे

जो पत्थरों को देख कर हथौड़ा छोड़ देते हैं
वे पत्थरों से नहीं बल्कि खुद से हार जाते हैं
जिन्होंने तेज करके धार प्रहार नहीं छोड़ा
उनके ही फ़ौलादी इरादों से चट्टान टूट जाते हैं|

सपना

बचपन में सपना था 
आसमान छूने का|

जवानी में सपना था
जिंदगी बदलने का|

और
बुढ़ापे में
जीवन एक सपना ही है|

Friday, 20 November 2015

सरकार

चुनाव जनता जिताती है कार्य कार्पोरेट का करते हैं
हम जनता के सपने को कार्पोरेट के हांथों बेच देते हैं|

Thursday, 19 November 2015

बेवफा जिंदगी

गुमराह मुहब्बत की कहानियों सी है उसकी जिंदगी
जब वक्त वफ़ा करता है तो जिन्दगी बेवफा हो जाती है|

Sunday, 15 November 2015

वैचारिक गुलामी

वैचारिक गुलामों 
की कोई अपनी भाषा नहीं होती
वैचारिक गुलाम
भेंड़ की तरह
अंध भक्ति
के राग अलापते हैं
और चाहे-अनचाहे
अपने मालिक की
मूर्खता के शिकार
हो जाते हैं |

Wednesday, 11 November 2015

एक नन्हीं सी चिड़िया

एक नन्हीं सी चिड़िया थी
तुम सी
डरती सी
घबराती सी
एक नन्हीं सी चिड़िया थी |

कांप जाते थे उसके भी पांव
जैसे सिहर जाती हो तुम
अनहोनी पर|

पर रुकते कहाँ थे
नन्हीं चिड़िया के कदम
जैसे तुम चलती रहती हो
अनथक|

कोई खास वजह थी
जीने की
नन्हीं चिड़िया के जीवन में
तुम्हारी ही तरह|

तुम्हारी ही तरह
दर्द से गहरा रिश्ता था
नन्हीं चिड़िया का भी|

घायल थी नन्हीं चिड़िया
पर लड़खड़ाकर चलती थी
तुम्हारी ही तरह
अपने वजूद के लिए|

घनघोर आँधियों में भी
नन्हीं चिड़िया को
हौसला देते थे
उसके अपने ही पंख
ऊँची उड़ानों का
तुम्हारी ही तरह|
तुम्हारी ही तरह
नन्हीं चिड़िया
देख रही है जग को
अपनी कातर आँखों से
और हँस रही है जग पर
जैसे जग हँसता है उस पर|

Tuesday, 10 November 2015

नफ़रत

नफ़रत सिर्फ
आतंकी नहीं फैलाते
नफ़रत फ़ैलाते हैं
लोलुप नेता
नफ़रत फैलाते हैं
बिके हुए बुद्धिजीवी
अपने स्वार्थ के लिए
ताकि ग़रीब को ग़रीब
रखकर
जाति को जाति में
बांटकर
लोगों की भावनाओं से
खेलकर
बेवजह के मुद्दों पर
गुमराह कर
देश को लुटा जा सके
जनता को छला जा सके
और
समाज के आखिरी आदमी
के हक़ पर
कब्ज़ा जमाया जा सके |

Saturday, 31 October 2015

वफ़ा

जहर देकर जीने की दुआ करते हैं|
इस तरह वे मेरे साथ वफ़ा करते हैं||

Friday, 30 October 2015

चेहरा

चेहरा कैसे बदलता है यह वक्त से पूछा करता था|
आज वक्त ने एक चेहरे को फिर से चाँद बना डाला|

Tuesday, 27 October 2015

बंदगी

गुनाहगार भी हूँ तो तेरी नजर में हूँ मैं
गर बंदगी करूँ तो तेरी नजर बन जाऊं|

Friday, 23 October 2015

चाहत

यकीन मानो मेरे दोस्त असर मेरी चाहत का है|
मै जिस पत्थर को चाहता हूँ देवता बना देता हूँ|

Monday, 5 October 2015

कारवां

कब तक बेवजह रोकोगे मेरे कारवां को तुम
इक दिन जिंदगी ही तुम्हें रुकने नहीं देगी|

Sunday, 4 October 2015

कमजोरी

कोई कमी तो न थी तुम्हारे बिना
अब तुम मेरी कमजोरी बन गई हो|

कारवां

जिसे सोचा था मंजर वह मुक्कदर निकल गया
मेरी राह का हर कारवां मंजिल तक पहुँच गया|

Tuesday, 29 September 2015

पूछो

तुम पूछो न पूछो दिल की बात
मैं पूछता हूँ कि पूछते क्यों हो?

Friday, 25 September 2015

जीवन संघर्ष

दिल को इक
संबल चाहिए
जीने के लिए|

इक राह चाहिए
मंजिल तक
पहुँचने के लिए|

इक
छत चाहिए
बसर करने के लिए|

जिंदगी में
'चाहने' और 'होने'
का जो फर्क है

वही जीवन संघर्ष है|

Sunday, 20 September 2015

आत्म चेतना

ठहर सा गया हूँ मैं
या कि ठहर गई है
वो आत्म चेतना
जो आँखों में आंसू
दिल के दर्द को
देख सो नहीं पाती थी|

कहीं सचमुच
अँधेरे में तो नहीं
खो गया हूँ मैं
जहाँ जिंदगी
उजाले की
मोहताज भी नहीं रही|

वो आवाजें
जो गूंजती थीं
आसमानों तक
वक्त के साथ
खो गई हैं मुझमें|

सारी रात
टकटकी लगाकर
अँधेरी रात से
नजरें मिलाने वाली
आँखें
आखिर क्यों
भूल गईं हैं
उन सपनों को
जिसके बिना
जीवन का कोई मकसद
नहीं था|

मजबूरियां
अब नहीं हैं
और नहीं है
वो आग
जिसने जिंदा रखा था मुझे |

अब जो है
वो ठहरा हुआ जल है
जो खूबसूरत तो है
पर बेमानी है
धोखा है उन उसूलों का
जिसे हासिल किया था
मैंने अपना सबकुछ खोकर|

Friday, 18 September 2015

मानवता

अजीब सा शख्स रहता है मुझमें
कि जितना मेरे शब्दों का
गला घोंटते हैं बेरहम
उतना ही मेरे शब्द
फौलादी बनकर
फिर-फिर छा जाते हैं अंतर्मन पर|

दमन के हर कुचक्र से
ऊपर उठता जाता हूँ मैं
क्योंकि मैं जानता हूँ कि
बौनापन होना
एक बरगद की मौत हो जाना है|

जुल्म से हारती नहीं है
जिजीविषा
मेरे दर्द कुरेदते रहते हैं मुझे
शब्दों का धार बनकर|

छुपा कर रखता हूँ
थोड़ी सी आशा
दिल में
ताकि पत्थर दिल होने से
बचा सकूँ खुद को
इस अमानवीय दुनिया में|

बेशक जकड़ दिए गए हों पांव
वक्त के जज्बातों से
मैं सैलाब को अपने
समंदर बनाता जाता हूँ|

चाहता हूँ एक समंदर
तुममें भी हो गरजता हुआ
देता हुआ माकूल जवाब
हर इक जुर्म को
ताकि बची रहे मासूमियत

बची रहे मानवता |

Saturday, 12 September 2015

अंतहीन प्यास

शब्द खो चुके हैं अपना अर्थ
या कि अर्थहीन हो गई हैं संवेदनाएं


दर्द भरे स्वर खो चुके हैं अपना कंठ
या कि दफ्न कर दिया गया है ईमान को     


अतिशय शोर से थरथराने लगी है धरती
या कि भय ने प्रेम को विषाक्त कर दिया है


जंग जीतने की हताशा फैली है हर कहीं  
या कि विवश हो गई है मनुष्यता?


विकास के अध नंगेपन में खोई है दुनिया
या कि सिसक रही है सभ्यता

नफ़रत से धधकती धरती में बची है
सिर्फ अंतहीन प्यास
पत्थर हो जाने की
अमिट हो जाने की| 

Tuesday, 8 September 2015

आँखें

आँखें जब देखती हैं भूख
तब चुप रहती हैं|

आँखें जब देखती हैं बेबसी
तब लाचार बन जाती हैं|

आँखें जब देखती हैं अन्याय
तब सब सह जाती हैं|

आँखें जब देखती हैं दर्द
तब कठोर हो जाती हैं|

आँखें दुनिया हो गई हैं
खोखली,संवेदनहीन
स्मृतिहीन |

आँखों के सपने
बूढ़े हो गए हैं
इस इंतजार में कि
घोर कालिमा से घिरी रात का
उजास कहीं हो|

Tuesday, 4 August 2015

जख्म

जख्म भी दिल को सुकून देता है|
गर जीने का अंदाज जुदा हो|

दिल

दिल भी अब दुकानदार हो गया है|
हर बात पे सौदा किया करता है|

Saturday, 18 July 2015

शिद्दत

बहुत दिनों के बाद खुद में देखा है तुम्हें
तुम्हें और भी शिद्दत से चाहने लगा हूँ मैं| 

Thursday, 16 July 2015

प्रेम

सांस की तरह है 
प्रेम
बेशर्त बेपनाह
दिल की गहराईयों में उतरता हुआ 
हर वक्त हर पल
जिंदगी के लिए।

मेरा मन

मेरा मन
मंदिर है
मस्जिद है
मदिरालय है|

मेरे मन में
अमन है
चैन है
शांति है |

क्योंकि
मेरे मन में
प्रेम है|